indian-security
Amit Srivastava
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सामरिक सूचनातंत्र
This article originally appeared in centreright.in. CRI content has now been subsumed in swarajyamag.com. The views expressed here are personal and do not necessarily reflect those of the editors of swarajyamag.com

आज के बदलते परिवेश में शक्ति संतुलन के वैश्विक समीकरण तेज़ी से बदलते जा रहे हैं. आर्थिक मंदी, ग्लोबल इस्लामिक जिहाद, चीन का उत्तरोतर शक्तिशाली होना – ये सब घटनायें विश्व का एक नया भूराजनैतिक मानचित्र प्रस्तुत करती हैं. इस नए मानचित्र में रूस का भी महत्व बढ़ गया है. सीरिया में लंबे समय से चल रहे गृहयुद्ध तथा इससे सम्बंधित संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका की अप्रभावी चेतावनियों ने यह साबित कर दिया है कि अब अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्र एकतरफा युद्ध की घोषणा नहीं कर सकते. इस बीच रूस, चीन तथा शंघाई-5 जैसे क्षेत्रीय संधियों की प्रमुख भूमिका विश्व में एशियाई शक्तियों के उदय का परिचायक है.

इस बदले परिपेक्ष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिप्राय न केवल सीमा की सुरक्षा, आतंरिक सुरक्षा एवं शांति,   राष्ट्रीय एकता तथा स्वायत्तता की सुरक्षा से है, अपितु अंतरराष्ट्रीय प्रभाव एवं कूटनीतिक सफलता से भी है. भूमंडलीकरण की वजह से आर्थिक पहलू भी राष्ट्रीय सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण कारक बन गया है. आज जब भू-राजनैतिक समीकरण हमेशा गतिशील हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा के समझ एवं नियोजन हेतु एक राष्ट्र की वर्तमान सुरक्षा तंत्र की कमियों को समझना तथा संभावनाओ की खोज करना आवश्यक है.

इस पृष्ठभूमि में जब हम भारत की वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा  का विश्लेषण करते हैं, तब हमारे सामने एक अव्यवस्थित सुरक्षा-तंत्र ही नज़र आता है. इस समय, जब अन्य एशियाई राष्ट्र विश्व शक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहे हैं, भारत की स्थिति इसके विपरीत है. भारत के अपने पड़ोसी राष्ट्रों से सम्बन्ध और बिगड़ते जा रहे हैं. पाकिस्तानी सीमा पर भारतीय सैनिकों के मारे जाने की घटना आम हो गई है – सिर काट कर मारना, युद्धविराम के बावजूद सोते समय गोलियों से उड़ा देना – ये सभी अंतर्राष्ट्रीय युद्ध अपराध के अंतर्गत आते हैं. इसके बावजूद भारत ने पाकितान के ऊपर ना ही कोई कूटनीतिक दबाव ना ही दण्डित करने का प्रयास किया. इन घटनाओं से उत्साहित हो चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में दूर तक धुसपैठ की. मालदीव में सत्ता-परिवर्तन प्रकरण, श्रीलंका में चीनी बड़े तथा नेपाल में माओवादियों का भारत के खिलाफ खुला षड़यंत्र, – ये सारी घटनाएँ भारत के कूटनीतिक विफलता तथा बाह्य सुरक्षा की निष्क्रियता का परिणाम हैं.

यद्यपि यह चीन और पाकितान जैसे आक्रामक पड़ोसियों से घिरा है तथा वैश्विक जिहाद के प्रमुख निशाने पर है, भारत का कमोबेश ढुलमुल रवैया आतंरिक तथा वाह्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. कूटनीतिक मुद्दों पर अपने ढीले प्रतिक्रिया के कारण भारत की छवि एक नरम राष्ट्र की हो गई है. गुन्नार मिर्डल ने अपनी पुस्तक एशियन ड्रामा में भारत को साफ्ट स्टेट कहा था. आज भी कूटनीतिक विश्लेषक भारत को एक नरम राष्ट्र के रूप में ही देखते हैं. पारंपरिक रूप से विचारकों और दार्शनिकों का देश भारत आज कूटनीतिक रूप से दिशाहीन हो गया है. यही कारण है की वैश्विक शक्ति के सन्दर्भ में भारत के स्थान की चर्चा करना अप्रासंगिक हो गया है. इस प्रकार महत्वहीन राष्ट्र किसी अन्य राष्ट्र के व्यवहारों को प्रभावित नहीं कर सकता.

भारत का यह महत्वहीन राष्ट्रीय छवि परम्परागत नहीं है. सिंधु सभ्यता के समय से ही भारत को शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में जाना जाता था, जहाँ अनेक छोटे-बड़े राज्य अस्तित्व में थे. इस्लामिक आक्रमण के बाद भी भारत को संपन्न तथा महत्वपूर्ण राष्ट्र माना जाता रहा. ब्रिटिश औपनिवेश ने न केवल व्यवस्था बदली अपितु इसने उत्तरोत्तर मानसिकता को भी हीन बना दिया. स्वतंत्रता के पश्चात भारत की सुरक्षा नीति इसी हीन भावना से ग्रसित रही है.

चाणक्य ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में लिखा है, ‘शक्ति का होना सामर्थ्य है, सामर्थ्य होने से सोच बदल जाती है’ (अध्याय ६). किसी भी राज्य का रणनीतिक व्यक्तित्व इसी सोच का व्यापक स्वरुप होता है. स्वतंत्रता के पश्चात जवाहरलाल नेहरु ने जिस विदेश नीति की नींव रखी, वह शक्ति की धारणा को उपेक्षित कर के रखी गयी, जिसका परिणाम कश्मीर समस्या, तिब्बत का अतिक्रमण एवं युद्ध में चीन के हाथों हार रही है. आज छह दशकों के बाद भी भारत की कूटनीति अदूरदर्शी तथा अस्थायी सोच के अनुरूप ही रही है. आतंरिक सुरक्षा के मामले में भी भारत की कोई स्पष्ट नीति नहीं रही है. इस नीतिगत आभाव को कुछ प्रमुख कारण निम्न है:

  1. राष्ट्रीय नेतृत्व : किसी भी राष्ट्रीय नेतृत्व की यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि वह अपने राष्ट्र को विश्व के पटल पर एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखे. इसके विपरीत भारत का राष्ट्रीय नेतृत्व भारतीय हितों को सबसे बाद में रखता है. शुरुआत में जब एक सशक्त एवं निर्णयात्मक नेतृत्व की जरूरत थी, नेहरु ने एक लचर व्यवस्था बनायी जो आतंरिक तथा बाह्य सुरक्षा हेतु परस्पर उम्मीद तथा अंतर्राष्ट्रीय संगठनो पर आश्रित थी. 1962 के भारत-चीन युद्ध ने एक व्यवथा की कलाई खोल दी. परन्तु कई अर्थों में वह लचर सामरिक नीति आज भी भारत की कूटनीति का अहम हिस्सा है. आज के बदलते भूराजनैतिक परिपेक्ष्य में भारत की उपयुक्त महत्ता दिलाने हेतु एक नए प्रतिमान तथा नए नेतृत्व की आवश्यकता है.

  2. सामरिक योजना का आभाव : वैसे समय में जब चीन तथा पाकिस्तान जैसे विरोधी राष्ट्रों इन धुरी बना कर भारत के सुरक्षा तंत्र को निशाना बनाना शुरू किया है, भारत के पास एक सामरिक योजना का नितांत आभाव है. पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा किये गए मुंबई हमले की भर्त्सना विश्व के सभी देशों ने की जबकि चीन चुप रहा. पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को समर्थन तथा हिंद महासागर में सामरिक सहयोगियों की ‘मोती-माला’ बना कर चीन ने भारत पर सामरिक बढ़त बना ली है. इसके बावजूद भी भारत कूटनीतिक स्थिति अस्पष्ट तथा असमंजस वाली है. सामरिक बढ़त से सम्बद्ध आर्थिक मामलों में भी भारत की कोई स्पष्ट नीति नहीं है. जब भी कोई कूटनीतिक समस्या उत्पन्न होती है, उससे अस्थायी तौर पर निबटाने का प्रचलन है. सामरिक योजना के आभाव में मजबूत भूराजनैतिक स्थान बना पाना असंभव है.

  3. नयी सुरक्षा चुनौतियों हेतु अक्षम : हाल ही में जब अमेरिकी नागरिक स्नोडेन ने अमरीकी गुप्तचर एजेंसी एन एस ए द्वारा विभिन्न देशों में किये जा रहे साइबर जासूसी का खुलासा किया तो भारत के विदेश मंत्री अमेरिका के पाले में खड़े नज़र आये. सामरिक दृष्टि से यह कार्य भारत के आतंरिक सुरक्षा के विपरीत था. स्पष्तः भारत के सामरिक सुरक्षा तंत्र में  साइबर सुरक्षा हेतु कोई व्यवस्था नहीं है. चीन अपनी टेलिकॉम कंपनियों के माध्यम से हार्डवेयर-इंस्टाल नाम की जासूसी भी करता है, और भारत ने चीनी कंपनियों को बहुत ज्यादा छूट दे रखी है. इन नए खतरों से निबटने हेतु एक नए सोच की जरूरत है, जो अब नए नेतृत्व से ही अपेक्षित है.

  4. अव्यवस्थित सामरिक सूचनातंत्र : बौद्धिक क्षमता, कुशलता तथा अनुभव की बजाय, सामरिक संगठनो के उच्च पदों पर राजनीति प्रेरित नियुक्तियाँ करने का प्रचलन है. इन कमियों की वजह से रबिन्द्र सिंह जो रॅा का जॅाइंट सेक्रेटरी था, अमेरिका को भारत की सभी सामरिक सूचनाएं पहुँचता रहा, उजागर होने पर वह अमेरिका भाग गया. इस प्रकरण में सम्मिलित किसी व्यक्ति को उचित सजा नहीं हुई, ना ही भारत के अमेरिका को कूटनीति दबाव में डाला. जबकि, स्नोडेन जैसे सामान मामले में अमरीका ने रूस के साथ कूटनीतिक गतिरोध तक बना डाला था. पिछले कुछ वर्षों तक भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे एम. के. नारायण का कार्यकाल ऐसे कई कमियों को उजागर करता है. इन्होने अपने पसंद के व्यक्तियों को रॅा तथा आई.बी. का प्रमुख बनाना चाहा, इस प्रयास में इन्होने इन संगठनों के कार्य को हतोत्साहित किया. ये सभी कमियां भारत के अव्यवस्थित सामरिक सूचना तंत्र को दर्शाती हैं. विभिन्न संगठनों में तालमेल, राष्ट्रीय सम्मान एवं सुरक्षा की आवश्यकता को सर्वोपरि बनाना जरूरी है.

  5. कूटनीतिक मुद्दों पर वोट-बैंक राजनीति का प्रभाव‌‍‌‍ : हाल के वर्षों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सामरिक मुद्दों पर ऐसे कदम उठाये हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध इनके वोट-बैंक से हैं. आतंरिक सुरक्षा के मामले में आई.बी. की सरकारी मंत्रियों तथा सत्ता पक्ष के नेताओं ने जम कर खिचाई की. जिसका एकमात्र उद्देश्य एक वर्ग विशेष को खुश करना था. कभी सिमी नाम के प्रतिबंधित आतंकी संगठन के वकील रहे सलमान खुर्शीद को विदेश मंत्री का महत्वपूर्ण पद देना इसी क्रम का कार्य है. वाह्य सुरक्षा के मामले में, तमाम आक्रमण करवाने वाले तथा आतंकियों को मदद देने वाले पाकिस्तान से बिना शर्त बातचीत को तैयार हो जाना, ‘अच्छे तालिबान’ के विचार को स्वीकारना, पाकिस्तान को एकतरफ़ा ‘सबसे प्रमुखता वाले राष्ट्र’ की श्रेणी देना… इत्यादि. राष्ट्रीय सुरक्षा  पर आतंरिक राजनीति का हावी होना एक भयावह संकेत हैं, जिसकी शुरुआत यूपीए सरकार ने कर दी है.

इन कमियों की बावजूद भारत को एक प्रमुख राष्ट्र के रूप में माना जाता है, जिसका प्रमुख कारण भारत की बड़ी बाजार व्यवस्था, तकनिकी विकास तथा कुशल कामगारों की उपलब्धता है. उपलब्ध संसाधनों तथा क्षमताओं का पूर्ण उपयोग कर भारत के सामरिक सूचनातंत्र को प्रभावी बनाया जा सकता है. इस हेतु सर्व प्रथम एक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की आवश्यकता है, जिसे किसी भी स्थिति में अतिक्रमित न किया जा सके. सुरक्षा के नए आयाम हेतु यह एक आवश्यक कदम है. नए सुरक्षा नीति के आधार पर खतरों के आकलन (रिस्क अस्सेस्मेंट) कर एक नए सामरिक सूचनातंत्र की आधारशीला रखी जा सकती है. क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में सकारात्मक बढ़त बनाने के लिए इस  सूचनातंत्र को व्यापक बनाया जा सकता है.

नए सुरक्षा एजेंसी जैसे की एन. आई. ए. बनाने की बजाय पहले से मौजूद संगठनों में ही  सामरिक तालमेल तथा कुशलता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. इन संगठनों को राजनितिक हित-पूर्ति हेतु उपयोग करने पर प्रतिबन्ध लगाने की व्यवस्था की भी जरूरत है. भूराजनीतिक शक्तिकरण हेतु  विश्वपटल पर भारत की छवि एक ‘नरम-राष्ट्र’ की बजाय एक ‘सशक्त-राष्ट्र’ की होनी चाहिए, जो एक दक्ष एवं सशक्त नेतृत्व द्वारा ही संभव है.